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आयुर्वेद ग्रंथ अनुसार जब-जब अधर्म बढ़ेगा, महामारी फैलेगी 
March 6, 2020 • डॉ. मुरारी किरारे, डॉ. प्रकाश जोशी, डॉ. ओ.पी. व्यास • Knowledge

वर्तमान में अल्प समय व्याधि के रूप में व्यक्त हुआ है। वर्तमान में अल्प समय में पूरे विश्व में फैल चुका है और कई लोगों जीवन लीला समाप्त कर चुका है। उच्च आधुनिक चिकित्सा पद्धति में उक्त व्याधि का कोई विशेष उपचार खोज नहीं पाए तथा अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि वायरस में म्यूटेशन की प्रवृत्ति अधिक रूप में पाई जाती है। आधुनिक औषध है एक समय पश्चात कार्य करना बंद कर देती है। जब भी कोई नई मेडिसिन का खोज करते हैं, तब वायरस का स्वरूप परिवर्तित हो जाता है। अधिक समय तक मेडिसिन का उपयोग करने से व्याधि के प्रति अप्रभावी हो जाता है। आयुर्वेद ग्रंथों में जनपदोध्वंश अध्याय में वर्णन अलग से किया है, जिसका अर्थ है एक व्यक्ति विशेष या अत्यधिक जन शक्ति को प्रभावित कर अधिक से अधिक लोग इस रोग से प्रभावित हो जाते हैं। आयुर्वेद में 5 विषम ज्वर तथा 13 संन्नपातिक ज्वर बताए गए एवं चार प्रकार के आगंतुक ज्वर तथा कोरोना वायरस के लक्षण प्रारंभ से ही वात श्लेषमिकज्वर के जो लक्ष्ण बताये है जैसा प्रतित होता है, बाद में श्लेष्म प्रधान सन्निपातिक ज्वर के प्रतित होते हैं, जो धातु और जोड़ों को प्रभावित करता है, व्यक्ति की प्रकृति देश काल के आधार पर लक्षण में भिन्नता हो सकती है। वैद्य समाज इस रोग से भयभीत हुए बिना जो चिकित्सा में वर्णित लक्षणों के आधार पर जो चिकित्सा बताई गई है, उससे रोगी को आरोग्य आरोग्य प्रदान की जा सकती है-
चिकित्सा रोगी को एकांत में रखें, कमरे में गूगल बचा गुरु नागर मोथा का हवन एवं धूपन करें, जिससे जीवाणु समाप्त हो जायेगा तथा जल में नीम की पत्ती उबालकर स्नान करें एवं सरसों का तेल नारियल का तेल गुरुबाधतेल गरम कर संपूर्ण शरीर में अभ्यगं करें। रोगी के सभी वस्तुओं को दूषित करते हुए पीने के पानी में तुलसी के पत्ते जल डालकर पिए। चंदन सुगंध बाला नागरमोथा डालकर षडंग पानी का प्रयोग करें। भोजन में लघु सुपाच्य आहार दलिया मूंग की दाल खिचड़ी सावा लोकी ग्वार फली आदि का प्रयोग करें। लाजादिपेया लाई 4 भाग पिपली एक तोला सेंधा नमक आवश्यकतानुसार प्रयोग रोककर बनाकर रोगी को दें। रात्रि में तुलसी पत्र हल्दी उबले हुए दूध का सेवन कर सकते हैं। नस्य के रूप में अणु तेल तिल तेल सरसों का तेल का उपयोग करें क्योंकि नासा ही इस रोग का मुख्य द्वार है। अत: नासा में नस्य पूर्ण हेतु इन तेलों का प्रयोग करें जो कि नासा मार्ग में होने वाले संक्रमण से बचाएगा।
धूम पान आयुर्वेद के साथ-साथ सभी वेदों में अपामार्ग गूगल बचा कपूर इलायची सभी द्रव्य जीवाणु नाशक द्रव्य है। इनका धूपन करने से जीवाणु समाप्त होते हैं।
औषधि प्रयोग
दशमूल क्वाथ 20 से 40 एम एल संजीवनी वटी दो-दो गोली त्रिभुवन कीर्ति रस 125 मिलीग्राम लक्ष्मी विलास रस 10 मिलीग्राम गोदंती भस्म मिलीग्राम शहद के साथ अभ्रक भस्म एवं रस सिंदूर 125 मिलीग्राम की मात्रा में शहद के साथ ले सकते हैं साथ ही अगस्त हरीत की 5 से 10 ग्राम दिन में दो बार और कास होने पर तालीसदी चूर्ण का प्रयोग कर सकते हैं। लवंगादि वटी तथा छाती पर सरसों का तेल सेंधा नमक मिलाकर पृष्ठ भाग मेंत अभ्यंग करना चाहिए तत्पश्चात पोटली द्वारा स्वेदन एवं इमरजेंसी में हेमगरभ पोटली का प्रयोग कर सकते हैं।
-डॉ. मुरारी किरारे, एम.डी. स्कालर
डॉ. प्रकाश जोशी, असिस्टेंट प्रोफेसर शा. धन्वन्तरि आयुर्वेद महाविद्यालय चिकित्सालय परिसर
निर्देशक डॉ. ओ.पी. व्यास, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष काय चिकित्सा विभाग