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श्वास रोग चिकित्सा में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व
October 13, 2019 • डॉ. प्रकाश जोशी


दमा दम के साथ जाता है, यह एक प्रचलित लोकोत्ति है। काफी हद तक यह सही भी है। लेकिन उचित आहार-विहार एवं युक्तिपूर्वक की हुई चिकित्सा से इसे ठीक भी किया जा सकता है। आयुर्वेद में उचित आहार-विहार के लिये ऋतुचर्या का विधान है। आर्युवेद मेें ऋषियों ने मानव जगत के हित व मार्गदर्शन के लिये बहुत ही प्रमाणिक और वैज्ञानिक ढंग से स्वास्थ्य के नियमों को दृष्टिगत रखते हुए काल विभाजन किया है। ऋतुकाल के अनुसार उचित आहार-विहार करने एवं अनुचित आहार विहार न करने का भी वर्णन है। अंग्रेजी में एक कहावत है 'प्रिवेंशन इज बेटर देन क्योरÓ यानी इलाज कराने की अपेक्षा बीमार होने से बचना अच्छा है। उचित आहार-विहार का पालन कर न सिर्फ रोगों से बचा जा सकता है। आयुर्वेद में शिशिर, बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद ऋतु पर पड़ने वाली शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है।
भारतीय कालगणना के अनुसार यह ऋतु आश्विन व कार्तिक माह में अंग्रेजी माह के अनुसार सितंबर, अक्टूबर, नवंबर में होती है। इस समय सूर्यबल क्षीणतर एवं चन्द्रबल पूर्णतर होता है। शरद ऋतु में पित्त का प्रकोप व वात का शमन होता है।
हमारे शरीर में फेफड़ों को वायु पहुँचाने वाली नलियाँ छोटी-छोटी मांसपेशियों द्वारा ढँकी रहती हैं। इन मांसपेशियों में आक्षेप होने के कारण साँस में तकलीफ होती है एवं गला आवाज करने लगता है इसे श्वास रोग या दमा कहते हैं। जिस तरह दौड़ने से जल्दी-जल्दी सांस आती है, उसी प्रकार यदि आराम से बैठने पर सांस लेना पड़े तो उसे दमा रोग कहते हैं। यह एक एलर्जिक रोग है। एलर्जी अर्थात निर्दोष पदार्थों के प्रति शरीर की विरोधी प्रतिक्रिया। अधिकांश लोगों को धूल, फफूंद, मांस, मछली आदि के संपर्क में आने से तकलीफ होने लगती है।
श्वास रोग के कारण
विदाही (जलन पैदा करने वाले) जैसे मिर्च, सरसों, गुरु तथा उड़द, सूअर मांस, कब्जकारक पदार्थ, स्नेहरहित तथा कफकारक पदार्थों के खाने से तथा शीत पेयों से, शीतल भोजन करने से, शीतल स्थान में रहने से, धूल एवं धुएँ के मुँह एवं नाक में जाने से, अधिक व्यायाम करने से, शक्ति से अधिक कार्य करने अथवा अधिक बोझ उठाने से, अधिक पैदल यात्रा करने से, मल-मूत्र आदि अधारणीय वेग को रोकने से, उपवास, व्रत आदि अधिक करने से श्वासरोग हो जाता है। जब वायु कफ से मिल जाती है तब वह उस कफ से प्राण, अन्न एवं जल के मार्गों को रोक देती है। उस अवस्था में वायु स्वयं भी कफ के कारण चारों ओर घूम नहीं सकती। कफ के कारण वायु के अवरुद्ध होने से श्वास रोग (दमा) की उत्पत्ति होती है।

शरद पूर्णिमा के दिन चिकित्सा
वैदिक साहित्यों में चन्द्रमा को औषधियों का अधिपति कहा गया है। शरद ऋतु में चन्द्र बल पूर्णतर होता है। शरद पूर्णिमा के दिन श्वास रोग चिकित्सा में औषधियुक्त खीर के सेवन का विधान है। संभवत: इस दिन औषध देवाधिपति चन्द्रमा की शीतल किरणों द्वारा औषधियुक्त खीर को अधिक वीर्यवान बनाया जाता है और बाद में कर्णवेधन किया जाता है एवं रोगी को सारी रात जागरण कराया जाता है। शास्त्रों में वर्णित है कि इस प्रयोग से एक ही रात में दमे का रोग नष्ट हो जाता है।
औषधियुक्त खीर पान
यह भारतीय चिकित्सा पद्धति की अनूठी विधा है, जिसमें शरद पूर्णिमा को चन्द्रमा की किरणों से सेवित विशेष औषधि का दूध में पाक कर प्रयोग कराए जाने से दम के साथ दमा जाने वाली लोकोक्ति पर प्रश्नचिन्ह लगता है, क्योंकि बहुतायत से शरद पूर्णिमा के दिन औषधियुक्त खीर पान से रोगी स्वस्थ होते देखे गए हैं।

कर्णवेधन का महत्व
मानव शरीर में होने वाली विभिन्न क्रियाएँ मस्तिष्क के नियंत्रण में होती है। मस्तिष्क इन क्रियाओं को नाड़ियों द्वारा संचालित करता है। इसमें से प्राणदा नाड़ी (वेगस नर्व) शरीर के विभिन्न अंगों के संचालन में अपना योगदान देती है। इसकी एक शाखा लेरिंग्स, ट्रेकिया तथा ब्रोंकायी एवं पल्मोनरी प्लक्सस में ब्रोंकियों संकुचन का कार्य करते हैं। प्राणदा नाड़ी की एक शाखा बाह्य कर्ण को जाकर संवेदना ग्रहण कराती है। इस प्रकार बाह्य कर्ण का वेधन कर्म नाड़ी के संवेदन द्वारा प्राणवायु प्रवाह की संवेदनशीलता को संदमित किया जाता है।


डॉ. प्रकाश जोशी
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13 अक्टूबर 2019 सायं काल 6 बजे से प्रात:काल तक शिविर आयोजित
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